Wednesday 13 June 2012

रूपोश

 रोष में खो बैठे क्यों, क्यों होश अपने ?
कहाँ से पयोगे अब वो पुर जोश अपने

मैं न 'मैं' की शमशीर उठाता दरमियान
क्यों छूटते, और रहते खामोश अपने ?

बेज़ार बेजात रख्खा अहल-ए-गरज को
अब क्यों न करे हमें निकोहिश अपने  ?

नाज़-ए-फौजदारी में वफ़ा कि उम्मीद ?
नादान इतने कि खो रहे हो होश अपने 

जू-ए-चाहत में फिर जब उतरना ही था
क्यों रख रहे हो दिल को रूपोश अपने ?

पुर जोश: zeal-fullness
शमशीर: sword, अहल-ए-गरज: needy people.
निकोहिश: blame, रूपोश : hidden

1 comments:

संध्या शर्मा said...

जू-ए-चाहत में फिर जब उतरना ही था
क्यों रख रहे हो दिल को रूपोश अपने ?
वाह... बहुत खूब...

Post a Comment

Twitter Delicious Facebook Digg Stumbleupon Favorites More

 
Design by Free WordPress Themes | Bloggerized by Lasantha - Premium Blogger Themes | Best CD Rates | Downloaded from Free Website Templates