Tuesday 21 February 2012

परिपथ

उस दिव्य आदित्य के कड़ लेकर
सोखता है वह जल कि बूंदों को
अम्बर से बनकर एक बीज
धरा के सीने में सो जाता है /
पल्वित हो, शोर मचाता निकल
पुलकित करता सबके मन को
सुमन नया फुलवारी में खिलता
रचने-गड़ने इस दुनिया को /
सागर कि अनगित लहरों से
जुड़ती जब एक है नई लहर
तूफानों से टकराने को
आती है एक घुंघराली वो नई तरंग /
कितनो से वह जुड़ जाएगा
कितनी लहरे जन्म दे जाएगा
इतिहास के पन्नो पर कभी
विदित अविदित उसकी गाथा /
चला जायेगा एक दिन
उसी आदित्य व्योम पवन में
कुछ अवशेष धरा को देकर
सागर में फिर खो जायेगा //

Tuesday 7 February 2012

ख़त

सुनहरे कागज मै लिपटा हुआ
सुबह एक ख़त मिला मुझको
बीते हुए लम्हों के करीब
बहुत करीब ले गया वह मुझको

ख़त मै लिखा था-
"तुम यादों का सफ़ीना
साहिल पर छोड़ आये
मेरी सूनी रातों मे
एक चाँद छोड़ आये
इन आँखों मे
दो आंसू छोड़ आये
आँगन मे कुछ
शबनम की बूंदे छोड़ आये
अंजान राहों मे
जीने की वजह छोड़ आये
मेरे दिल के परदे पर
अपनी शबीह छोड़ आये "
उस ख़त मे न कोई नाम न पता लिखा उसका
दिल की गहराइयों मे बसा था हर पहलू उसका
सुबह से कई बार पड़ चूका हूँ ये ख़त उसका
अब शाम होने से पहले ढूड़ना होगा पता उसका //

सफ़ीना: boat, शबीह : photograph, शबनम: dew

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